जारी हे यहाँ से - गुरमुख: गुरु साहिबान के अनुभव भाग १
२.५ मोक्ष और वास्तविकता का विचार
ਆਵਣੁ ਜਾਵਣੁ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਵੀਚਾਰੋ ॥[1]
आवणु
जावणु ठाकि रहाए गुरमुखि ततु वीचारो ॥
वास्तविकता
क्या है? यह प्रश्न मनुष्य के अंतर्मन में गूंजता रहता है| हर कोई अपने अनुभव के आधार
पर स्वयं की वास्तविकता बुनता है। और हम सभी उस वास्तविकता के लिए लड़ते हैं जो हमने
बनाई है| लेकिन हम भूल जाते हैं, हमारे अवलोकन और अनुभव करने के साधन अतयंत सीमित हैं
| हम सभी मानते हैं कि मृत्यु अंतिम सत्य है। वास्तविकता में परम सत्य यह है जीवन और
मृत्यु के चक्र को तोड़कर मुक्ति प्राप्त करना| और गुरु की कृपा से गुरुमुख ऐसा ज्ञान
प्राप्त करता है, उस पर विचार करता है और अंत में मोक्ष पा लेता है|
२.६ अकाल पुरख के नाम का जाप और ध्यान
ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ਸਾਚੁ ਚਵਾਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣਾ ॥[2]
सचु
नामु धिआई साचु चवाई गुरमुखि साचु पछाणा ॥
ਜਪੁ ਜਾਪਉ ਗੁਰਮੁਖਿ
ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੭॥[3]
जपु
जापउ गुरमुखि हरि नाउ ॥७॥
ਸਦਾ ਸਰੇਵੀ ਇਕ ਮਨਿ
ਧਿਆਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚਿ ਸਮਾਵਣਿਆ ॥੧॥[4]
सदा
सरेवी इक मनि धिआई गुरमुखि सचि समावणिआ ॥१॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਗੁਰਮੁਖਿ
ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਧਿਆਇ ॥[5]
मेरे
मन गुरमुखि नामु हरि धिआइ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਮੇਲਾਵੜਾ
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਿਰੁ ਚੀਨ੍ਹ੍ਹਾ ਰਾਮ ॥[6]
वडभागी
मेलावड़ा गुरमुखि पिरु चीन्हा राम ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਨਕ
ਤਿਸੈ ਅਰਾਧੇ ਮਨ ਕੀ ਆਸ ਪੁਜਾਏ ਜੀਉ ॥੪॥੨੩॥੩੦॥[7]
गुरमुखि
नानक तिसै अराधे मन की आस पुजाए जीउ ॥४॥२३॥३०॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਇਆ
ਨਾਮੁ ਹਉ ਗੁਰ ਕਉ ਵਾਰਿਆ ॥[8]
गुरमुखि
पाइआ नामु हउ गुर कउ वारिआ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲਿਓਨੁ ਮੁਖਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਸੀ ॥[9]
करि
किरपा सतिगुरु मेलिओनु मुखि गुरमुखि नामु धिआइसी ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਮੈ ਅਵਰੁ
ਨ ਕੋਈ ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਲੈਨਾ ॥੧॥
ਰਹਾਉ ॥[10]
नाम
बिना मै अवरु न कोई वडै भागि गुरमुखि हरि लैना ॥१॥ रहाउ ॥
ਰੋਮੇ ਰੋਮਿ ਰੋਮਿ
ਰੋਮੇ ਮੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮੁ ਧਿਆਏ ਰਾਮ ॥[11]
रोमे
रोमि रोमि रोमे मै गुरमुखि रामु धिआए राम ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਲਇਆ
ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਰਲੇ ॥[12]
गुरमुखि
नामु लइआ जोती जोति रले ॥
मनुष्य का मन चंचल है | मन इतना चंचल है कि मनुष्य किसी भी वस्तु या विषय पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर सकता। और बिना ध्यान केंद्रित किए अंतर्मुखी बनना अत्यंत कठिन है | ये कभी न भूलें कि मन को टटोले बिना, हम कभी भी अंतर्मन में छिपे हुए सच्चे रत्नों को नहीं पहचान सकते। जिन्हें इसका एहसास हुआ, उन्होंने अतंर्मन पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया, लेकिन ऐसा करने में वे ऐसे तत्वों पर निर्भर हो गए जो क्षणिक हैं। और अस्थायी कभी भी सच नहीं होता क्योंकि वो नश्वर होता है। लेकिन गुरमुख गुरु की कृपा से यह जान जाता है कि अकाल पुरख का नाम ही सत्य है । वह अपने जीवन के प्रत्येक क्षण, अपना ध्यान अकाल पुरख के नाम पर केंद्रित करता है और उसे जपता है। उसके लिए अकाल पुरख का नाम ही सबसे महान है। वह स्वयं को भाग्यशाली मानता है कि उसे अकाल पुरख के नाम की प्राप्ति हुई है और गुरु की कृपा से वह उसमें समा जाता है |
२.७ अकाल पुरख से निकटता
ਅਬ ਜਾਨੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਨਾਲੀ ॥੨॥[13]
अब
जाने गुरमुखि हरि नाली ॥२॥
यह
एक सांसारिक तथ्य है कि जीवन एक संघर्ष है। बुद्धिजीवी लोग कहते हैं कि जीवन संघर्ष
है क्योंकि यह घर्षण के साथ आरम्भ होता है। और जीवन की यात्रा में हमें साथी की आवश्यकता
पड़ती है क्योंकि साथ की चाह अकाल पुरख ने मनुष्य के अंतर्मन में बीज रखी है | क्षण
चाहे हर्ष का हो या पीड़ा का हम यही इच्छा रखते हैं की कोई हमारे निकट हो| क्योंकि हमारी
सोच सीमित है हम केवल नश्वर तत्वों पर ही निर्भर रहते हैं| लेकिन अंत में कोई साथ नहीं
रहता केवल अकाल पुरख के धन श्री गुरु तेग बहादुर जी के शब्दों अनुसार |
ਅੰਤ ਬਾਰ ਨਾਨਕ
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਜੀ ਕੋਊ ਕਾਮਿ ਨ ਆਇਓ ॥੩॥੧੨॥੧੩੯॥[14]
अंत बार नानक
बिनु हरि जी कोऊ कामि न आइओ ॥३॥१२॥१३९॥
गुरु
जी ने इन शब्दों में यह भी दृढ़ कराया कि है मनुष्य को अपने जीवन में जितना हो सके अकाल
पुरख के निकट जाना चाहिए | यह केवल तब संभव है जब एक मनुष्य अकाल पुरुष को अपने निकट
देखता है। और ऐसी कृपा गुरुमुख पर होती है |
२.८ जागृत और बंधन मुक्त
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗਿ ਰਹੇ ਅਉਧੂਤਾ ॥[15]
गुरमुखि
जागि रहे अउधूता ॥
विज्ञान
ने एक तथ्य उजागर किया है की मनुष्य शरीर के लिए विश्राम अति आवश्यक है | इसलिए नींद
को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि गहरी नींद में मानव शरीर अपनी मरम्मत करता
है और थकान को दूर करता है। गहरी निद्रा के बाद जब मनुष्य जागता है तो वह ऊर्जा से
भरपूर होता है | यह मनुष्य को दैनिक कार्यों को सरलता से करने में सहायक होता है |
यह एक दैनिक प्रक्रिया है | परन्तु मनुष्य को यह जानना चाहिए कि उसका मन भी न जाने
कितनो जन्मों से सो रहा है अर्थात अचेतन अवस्था में है । और उसे जागरूक होने की आवश्यकता
है ताकि वह उन घटनाओं की जान सके जो अचेतन मन नहीं जान सकता | जागरूकता उसे मनुष्य
जीवन का उद्देश्य जानने में सहायक होती है और यह सुनिश्चित करती है कि वह सभी सांसारिक
बन्धनों को तोड़कर मुक्त हो सके। गुरमुख गुरु की कृपा से ऐसी अवस्था को प्राप्त होता
है जो उसे जागृत करती है और वो सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है |
२.९ अकाल पुरख से विलय
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਅਤਿ ਵਡਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਾਇਸੀ ॥੫॥[16]
सो
प्रभु मेरा अति वडा गुरमुखि मेलाइसी ॥५॥
ਸੁਮਤਿ ਪਾਏ ਨਾਮੁ
ਧਿਆਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਏ ਮੇਲਾ ਜੀਉ ॥੩॥[17]
सुमति
पाए नामु धिआए गुरमुखि होए मेला जीउ ॥३॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲਿਆ
ਸੁਭਾਇ ਹਰਿ ਮਨਿ ਤਨਿ ਮੀਠਾ ਲਾਇਆ ਬਲਿ ਰਾਮ ਜੀਉ ॥[18]
गुरमुखि
मिलिआ सुभाइ हरि मनि तनि मीठा लाइआ बलि राम जीउ ॥
ਵੀਆਹੁ ਹੋਆ ਮੇਰੇ
ਬਾਬੁਲਾ ਗੁਰਮੁਖੇ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ॥[19]
वीआहु
होआ मेरे बाबुला गुरमुखे हरि पाइआ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਢੂੰਢਿ
ਢੂਢੇਦਿਆ ਹਰਿ ਸਜਣੁ ਲਧਾ ਰਾਮ ਰਾਜੇ ॥[20]
गुरमुखि
ढूंढि ढूढेदिआ हरि सजणु लधा राम राजे ॥
ਹਰਿ ਦਾਤੜੇ ਮੇਲਿ
ਗੁਰੂ ਮੁਖਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਸਾ ॥[21]
हरि
दातड़े मेलि गुरू मुखि गुरमुखि मेलसा ॥
एक
मनुष्य के अंतर्मन में महानता को पा लेने की इच्छा प्रबल होती है। अपनी जीवन यात्रा
में वो महानता की खोज करता है| परन्तु सीमित सोच के चलते मनुष्य नीचता को ही महानता
समझ लेता है| और उसका अहंकार उसे नीच कर्म काम करने के लिए बाध्य करता है। जैसे की
अपने राज का विस्तार करने के लिए मासूम और निर्दोष लोगों का संहार करना| किसी भी प्रकार
से, यह महानता नहीं है, यह सिर्फ एक भ्रम है, छलावा है। परन्तु गुरुमुख गुरु की कृपा
से ये जान जाता है की वास्तविक महानता केवल अकाल पुरख है। और उसके चित में अकाल पुरख
से मिलने को इच्छा जाग जाती है | वो अकाल पुरख से अरदास करता है की अकाल पुरख से उसका
विलय हो जाए | उसकी मन में यह भावना घर कर जाती है की उसका अकाल पुरख से मिलन एक विवाह
जैसा है जहाँ वो अपने प्रीतम अकाल पुरख से अवश्य मिलेगा | वो अपने अंतर्मन में अकाल
पुरख को खोजता है और गुरु की कृपा से उसे अकाल पुरख की प्राप्ति होती है | उसका विलय
अकाल पुरख से हो जाता है |
२.१० तारनहार
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰੇ ॥੧੮॥[22]
नानक
गुरमुखि उतरसि पारे ॥१८॥
एक व्यक्ति जो समुद्र की धारा के बीच फंसा हुआ है, तट पर जाना चाहता है। वह सुरक्षित महसूस करना चाहता है। समुद्र के बीच डूबने का भय हमेशा उसके मन में बना रहता है। इसी प्रकार मनुष्य का इस संसार रूपी सागर में फंसे रहना का भय हर पल सताता है | यह डर उन्हीं को सताता है जो समझ चुके हैं की मनुष्य जीवन का उद्देश्य है अकाल पुरख से मिलन | और उन्हें इसके लिए भव सागर को लाँघना है | उसे ऐसे करने के लिए किसी की साथ की आवयश्कता महसूस होती है | ऐसा साथ जो उनकी नइया पार करा सके | ऐसी सहायता गुरु की कृपा से गुरमुख द्वारा प्रदान की जाती है। लेकिन याद रखें, यह एक निःस्वार्थ सेवा होती है।
[1] आसा महला १ - अंग ४३७ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[2] धनासरी महला १ - अंग ६८९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[3] रामकली महला १ - अंग ९०६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[4] माझ महला ३ - अंग १२६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[5] मारू महला ३ - अंग ९९४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[6] बिलावल महला ५ अंग - ८४८ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[7] माझ महला - ५ अंग १०३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[8] पउड़ी - अंग ७९१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (धन श्री गुरु अमर दास जी)
[9] सलोक महला ४ - अंग ३१० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[10] आसा महला ४ - अंग ३६६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[11] राग आसा छंत महला ४ घर १ - अंग ४४३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[12] छंत - अंग ७०५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (धन श्री गुरु अर्जन देव जी)
[13] बिलावल महला १ - अंग ७९६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[14] सोरठि महला ९ - अंग ६३४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[15] रामकली महला १ - अंग ९०४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[16] पउड़ी - अंग ५१० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (धन श्री गुरु अमर दास जी)
[17] माझ महला - ५ अंग १०२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[18] सूही महला ४ - अंग ७७४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[19] सिरी राग महला ४ घर २ छंत - अंग ६९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[20] आसा महला ४ - अंग ४४९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[21] आसा महला ४ छंत घर ५ - अंग ४५२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[22] रामकली महला १ सिद्ध गोसट - अंग ९३९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

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