Sunday, September 21, 2025

18. हिंदी कविता - मन की व्यथा

 

शब्दों का उच्चारण, श्वासों का मंथन,

कितना सरल कितना कठिन, क्या जान सका क्षणिक मन?

विचारों का उद्गम, मति का विश्लेषण,

कितना स्थूल कितना सूक्ष्म, क्या समझ सका अचेतन मन?

भावनाओं का मिलन, असंख्य तंतुओं का संगम,

कितना परोक्ष कितना प्रत्यक्ष, क्या टटोल सका चंचल मन?

अनंत का विस्तार, तत्वों का समागम,

कितने उत्तर कितने प्रश्न, क्या खोज सका सीमित मन?

शब्दों का अर्थ, अर्थों का रस

कितना आत्मिक कितना भौतिक, क्या पचा सका अज्ञानी मन?

एकांत में काँपता, भीड़ से लड़ता,

कितना व्यर्थ कितना सक्षम, क्या बूझ सका अभिमानी मन?

धन की क्षुब्धा, विकास का मापदंड,

कितना वास्तविक कितना छलावा, क्या सब समेट सका लोभी मन?

डाहा दिए इस मन ने, जीवन के अमूल्य पल,

कितना पाया कितना खोया, क्या हो सका समर्पित मन? ‘तरुण’

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