जारी है यहाँ से - गुरमुख धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के अनुसार
१.१
गुरु के प्रति समर्पित
ਜਿਨ
ਕੈ ਪੋਤੈ ਪੁੰਨੁ ਹੈ ਸੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਿਖ ਗੁਰੂ ਪਹਿ ਜਾਤੇ ॥੧੬॥[1]
जिन कै पोतै पुंनु है से गुरमुखि सिख गुरू पहि जाते ॥१६॥
'गुरमुख' शब्द दो शब्दों
की संधि से बना है - 'गुरु
एवम् मुख'।
अर्थात् वह व्यक्ति जिसने अपना मुख गुरु की ओर मोड़ दिया हो। ऐसा मनुष्य केवल गुरु
की इच्छा अनुसार अपने जीवन का व्यापन करता है। गुरु की आज्ञा ही उसके लिए सर्वोपरि
होती है। सिख इतिहास में इस तरह का उदाहरण 'भाई लहना जी' ने सबसे पहले
प्रस्तुत किया था। आप जी ने अपनी सुध भुला के केवल गुरु की आज्ञा का पालन किया और
गुरु के प्रति आपका यह समर्पण आपको आध्यात्मिक शिखर पर ले गया। इसलिए ‘धन श्री
गुरु नानक देव जी’ ने आपको, गुरु का सिंहासन प्रदान किया और आप
'धन श्री गुरु अंगद देव जी' अर्थात 'गुरु का अंग' नाम से जाने
गए। 'आपका' जीवन केवल सिख
इतिहास में ही नहीं अपितु पूर्ण मनुष्य इतिहास में एक उदाहरण है जो दर्शाता
है की गुरु के प्रति समर्पित होने का अर्थ क्या होता है।
१.२
गुरु के वचन की अभिव्यक्ति
ਜਨ
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥੪॥੨॥[2]
जन नानक
गुरमुखि परगटु होइ ॥४॥२॥
गुरबाणी के अनुसार ‘अकाल पुरख’
गुरमुख के माध्यम से प्रकट होता है। यह तभी सम्भव है जब गुरमुख गुरु का रूप बन
जाए। और सिखी में बाणी को गुरु रूप माना गया है[3]। भाई लहना जी
अपने गुरु का रूप बन चुके थे।
गुरु के हर वचन को आपने हर तरह से
निभाया। गुरु
का उचारा हर शब्द आपके लिए सत्य की अभिवयक्ति थी। और वो समय भी
आया जब पातशाही १ ने आपको ऐसी दात प्रदान की कि ‘गुरु नानक’ आप के भीतर पूर्ण रूप
से समा गए। आप में
से 'उनके' दर्शन होने लगे। आपके रोम - रोम
से गुरु की बाणी प्रकट होने लगी।
यह सब दर्शाता है कि गुरु के प्रति समर्पित गुरमुख गुरु के वचन की अभिव्यक्ति
बन जाता है। गुरमुख के लिए यह बहुत बड़ा सम्मान है कि गुरु ने गुरमुख को ऐसे
शब्दों में परिभाषित किया है।
१.३
आध्यात्मिक मित्र
ਕੋਈ
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਜਣੁ ਜੇ ਮਿਲੈ ਮੈ ਦਸੇ ਪ੍ਰਭੁ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥[4]
कोई
गुरमुखि सजणु जे मिलै मै दसे प्रभु गुणतासु ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਜਣੁ ਗੁਣਕਾਰੀਆ ਮਿਲਿ ਸਜਣ
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥[5]
गुरमुखि सजणु गुणकारीआ मिलि सजण हरि गुण गाइ ॥
अगर गुरबाणी के अनुसार ‘अकाल पुरख’
गुरमुख के माध्यम से प्रकट होता है तो इस में कोई सन्देह नहीं होना चाहिए कि
गुरमुख एक आध्यात्मिक मित्र है। ऐसा मित्र जो 'अकाल पुरख' के प्रति आपके
मन में समर्पण का भाव उत्पन्न करे। आपको 'उसकी निधियों’ से अवगत कराए जो अन्नत हैं। इतना
ही नहीं 'उसकी' दात को भी आप
तक पहुँचाए और वो भी बिना किसी स्वार्थ के। आप के साथ बैठ कर 'उसका' कीर्तन गाए और
आपको भी 'उसका' कीर्तन गाने के
लिए प्रेरित करे। वो स्वयं तो भीगा ही हुआ है ईश्वरीय प्रेम में और आपकी सुध को भी
ईश्वर के चरणों के साथ जोड़ दे,
तो आप ऐसे मनुष्य को क्या कहेंगे? जी हाँ,
ऐसा मनुष्य सच्चा मित्र कहलवाने के ही लायक है। जिसका उद्देष्य है आपको
आध्यात्म की ऊँचाइयों पर ले जाना।
१.४
अकाल पुरख का विनम्र और निस्वार्थ सेवक
ਸੇਵਕ
ਸੇਵਹਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਜਾਤਾ ॥[6]
सेवक
सेवहि गुरमुखि हरि जाता ॥
ਸੇਵਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿਆ ਸੇ ਹੰਸੁਲੇ
ਨਾਮੁ ਲਹੰਨਿ ॥੨॥[7]
सेवक गुरमुखि
खोजिआ से हंसुले नामु लहंनि ॥२॥
आपको आध्यात्मिक ऊँचाइयों पर ले
जाने में वही सक्षम है जो स्वयं आध्यात्म के शिखर पर खड़ा है। और आध्यात्म के शिखर
पर वही पहुँच सकता है जो विनम्र है। विनम्रता ऐसे व्यक्ति को प्रेरित करती है
समर्पण के लिए।
उसके अंतर्मन में सेवा का भाव जागृत होता है। ध्यान देने
वाली बात यह है की वो यह सेवा की भावना किसी राजा, महाराजा या
बादशाह के प्रति उत्पन्न नहीं होती क्योंकि सांसारिक सिंहासन पर बैठने वाले लगभग
सभी मनुष्य अहंकारी और स्वार्थी होते हैं। स्वार्थ और
अहंकार का विनम्रता से कोई मेल नहीं है। इसलिए जब किसी मनुष्य के मन में विनम्रता का भाव उत्पन्न
होता है तो वो केवल ‘अकाल पुरख’ की और आकर्षित होता है और गुरमुख ईश्वर का सेवक
बनकर अपना जीवन व्यतीत करता है।
जैसे सेवक अपने मालिक से कोई प्रश्न नहीं पूछता वैसे ही गुरमुख अपने गुरु से
कोई भी प्रश्न नहीं पूछता चाहे गुरु उसे किसी भी अवस्था में रखे । वो अपने गुरु
के कर शब्द को विनम्र होकर स्वीकार करता है।
१.५
पवित्र संत
ਗੁਰਮੁਖਿ
ਸਾਧ ਸੇਈ ਪ੍ਰਭ ਭਾਏ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਆਪਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥੧॥[8]
गुरमुखि साध सेई प्रभ भाए करि किरपा आपि मिलावै ॥१॥
जो तत्पर है दूसरों को आध्यात्म के
शिखर पर ले जाने के लिए;
जो ‘अकाल पुरख’ का निस्वार्थ सेवक है तो इसमें कोई संदेह नहीं चाहिए कि वो
पवित्रता से परिपूर्ण हो गया है।
उसके प्रयास दूसरों के परोपकार पर केंद्रित हैं। अपना सब कुछ
गँवा कर वो दूसरों का भला करने की ओर निरंतर अग्रसर रहता है। यही कारण है कि
गुरबाणी ने उसे पवित्र संत कहकर सम्बोधित किया है। केवल इतना ही
नहीं वो ‘अकाल पुरख’ को भी प्रिय है। इसीलिए ‘अकाल पुरख’ ने उसे आशीर्वाद में पवित्रता का गुण
प्रदान किया है और संतों जैसे जीवन वरदान में दिया है।
१.६
अकाल पुरख का ध्यान करने वाला; अकाल
पुरख का भक्त
ਗੁਰਮੁਖਿ
ਜਿਨੀ ਧਿਆਇਆ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਗਿ ਤੇ ਪੂਰੇ ਪਰਵਾਨਾ ॥੩॥[9]
गुरमुखि
जिनी धिआइआ हरि हरि जगि ते पूरे परवाना ॥३॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਸਲਾਹ ਹੈ ਅੰਤਰਿ
ਸਬਦੁ ਅਪਾਰਾ ॥੩॥[10]
गुरमुखि भगति सलाह है अंतरि सबदु अपारा ॥३॥
‘अकाल पुरख’ का
विनम्र और निस्वार्थ सेवक केवल वही बन सकता है जो ‘अकाल पुरख’ का ध्यान करता है और
उसकी भक्ति में लीन रहता है।
गुरमुख को भक्ति गुरु के वरदान के रूप में प्राप्त होती है। भक्ति वो आभूषण
है जिसे धारण करके गुरमुख धन्य हो जाता है। भक्ति गुरमुख
को असीम ऊँचाइयों पर ले जाती है।
भक्ति ये सुनिश्चित करती है की उसकी मत गुरु के प्रति सम्पर्पित हो जाए और
उसके अंतर्मन में केवल गुरु के शब्दों का वास हो। और इसीलिए
गुरबाणी में भक्त का दर्जा भी सर्वोपरि है। यही कारण है की
‘धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी’ में भक्तों की बाणी भी विद्यमान है जिनकी बाणी के
सम्मुख हर सिख पूर्ण श्रद्धा से अपना शीश झुकाता है।
१.७
शब्द विचार करने वाला
ਗੁਰਮੁਖਿ
ਸਾਚੁ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੈ ਕੋਇ ॥[11]
गुरमुखि साचु सबदु बीचारै कोइ ॥
गुरबाणी में शब्द विचार को भी
सर्वोपरि कहा गया है।
जो भी गुरु के शब्द से जुड़ता है उसे 'अकाल पुरख'
की अनंत दात प्राप्त होती हैं। धन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने भी धन श्री गुरु ग्रन्थ
साहिब जी को गुरगद्दी सौंपते हुए यही निर्देश दिया था और यही विचार दृढ़ करवाया था
की यदि कोई ‘अकाल पुरख’ से मिलना चाहता तो उसे ‘उसकी’ खोज धन श्री गुरु ग्रन्थ
साहिब जी में उपस्थित शब्दों के माध्यम से करनी चाहिए। और गुरमुख के
लिए गुरु की आज्ञा प्रधान है।
यही कारण है की गुरमुख शब्द विचार में लीन रहता है।
१.८
जिसका मन अकाल पुरख के ‘नाम’ से भीगा हुआ है
ਹਰਿ
ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਜਿਨਾ ਮਨੁ ਭੀਨਾ ਤੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਰਿ ਪਇਆ ॥੨॥[12]
हरि हरि नामि जिना मनु भीना ते
गुरमुखि पारि पइआ ॥२॥
ਨਾਮੁ ਰਸਾਲੁ ਜਿਨਾ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਤੇ
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਰਿ ਪਇਆ ॥੩॥[13]
नामु रसालु जिना मनि वसिआ ते गुरमुखि पारि पइआ ॥३॥
‘अकाल पुरख’ का
भक्त; गुर
शब्द का विचार करने वाला;
‘अकाल पुरख’ का निस्वार्थ सेवक, तो इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए की यह तभी
संभव है जब गुरमुख पूर्ण रूप से ‘अकाल पुरख’ के 'नाम' में डूबा हुआ
है। 'नाम' में लीनता उसे
असीम आंतरिक आनंद प्रदान करती है और उसके चिर काल से संग्रह हुए पापों का अंत कर
देती है। वो
जीवन चक्र से मुक्त हो जाता है और संसार रुपी भाव सागर को पार कर लेता है।
१.९
उद्धार कर्ता
ਆਪਿ
ਤਰੈ ਕੁਲ ਸਗਲੇ ਤਾਰੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਨਮੁ ਸਵਾਰਣਿਆ ॥੩॥[14]
आपि तरै
कुल सगले तारे गुरमुखि जनमु सवारणिआ ॥३॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਟਿ ਅਸੰਖ ਉਧਾਰੇ ॥[15]
गुरमुखि कोटि असंख उधारे ॥
जिसके अंतर्मन में निस्वार्थ की
भावना जन्म ले चुकी हो,
उसकी सोच,
कर्म और जीवन दूसरों के उद्धार के लिए समर्पित हो जाते हैं। सोच और कर्मों
की गुणवत्ता इतनी बढ़ जाती है कि मुक्ति का द्वार स्वयं खुल जाता है। निस्वार्थ
भावना यह निश्चित करती है कि मुक्ति का द्वार उन सब के लिए खुल जाए जो भी उनके
संपर्क में आए।
गुरमुख अपने जीवन को संवार लेता है। वो अपने जीवन का उद्देश्य पूर्ण करता है। उसकी अवस्था उस
शिखर पर होती है जहाँ वे पूर्ण मानवता को अपना परिवार मानते है। इसलिए गुरमुख
केवल 'कुल
तारक' ही
नहीं होते अपितु अनंत जीवों को भी मुक्त करने का प्रयास करते हैं।
१.१०
जिसके पास आध्यात्मिक ज्ञान है और वो वास्तविकता के सार पर विचार करता है
ਙਿਆਨੀ
ਤਤੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੀਚਾਰੀ ॥[16]
ङिआनी ततु गुरमुखि बीचारी ॥
इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए
की जो ईश्वर की भक्ति में लीन है और गुरु के हर शब्द को सर्वोपरि मानता है उसके
पास आध्यात्मिक ज्ञान का भंडार होगा। यह ज्ञान उसे गुरु की कृपा से प्राप्त होता है क्योंकि वो
गुरुमुख बन चुका है।
अगर हम सांसारिक तार्किकता के अनुसार टटोलें तो विचार करने योग्य तथ्य ये है
की जिसके पास ज्ञान होता है वो ज्ञान के अहंकार में मद रहता है। वो सबको अपने
से तुच्छ समझता है।
अहं में डूबा हुआ वह भ्रमित रहता है और ‘अकाल पुरख’ वास्तविकता को नकार देता
है। उसकी
सोच का दायरा इतना सिमट जाता है की वो केवल इन्द्रियों के अनुभव को ही वास्तविकता
मान लेता है।
और केवल मनमुख बन के रह जाता है। परन्तु गुरु के कृपा से मिला ज्ञान गुरमुख को हर क्षण नम्र
रखता है और इसी कारण वह वास्तविकता को पहचान लेता है जो यह है कि मैं कुछ भी नहीं
हूं। मैं शून्यता से उत्पन्न हुआ हूँ। और केवल गुरु की कृपा से ही मैं उसमें विलीन हो सकता हूँ।
इसी वास्तविकता का विचार उसके चित में गुरु की कृपा से सदा के लिए उसकी चेतना में
समा जाता है।
१.११
जिसके लिए अकाल पुरख स्वयं को प्रकट करता है
ਨਾਨਕ
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਣੀਐ ਜਾ ਕਉ ਆਪਿ ਕਰੇ ਪਰਗਾਸੁ ॥੩॥[17]
नानक गुरमुखि जाणीऐ जा कउ आपि करे परगासु ॥३॥
गुरमुख गुणों का भण्डार होता है -
भक्ति से लेकर आध्यात्मिक ज्ञान तक - निस्वार्थ सेवक से पवित्र संत तक। यह सभी गुण 'अकाल पुरख' की देन होते
हैं। क्योंकि
इन गुणों का स्रोत केवल और केवल
'अकाल पुरख'
ही है। और ये
गुण उसी के भीतर उजागर होते हैं जिसके लिए ‘अकाल पुरख’ स्वयं को प्रकट करता है। जिसके अंतर्मन
में 'अकाल
पुरख' का
निवास नहीं उसके अंदर ये गुण कभी भी बस नहीं सकते। यहाँ तक की वो
इन गुणों को कभी पहचान ही नहीं पाता।
१.१२
एक सेतु है
ਗੁਰਮੁਖਿ
ਬਾਂਧਿਓ ਸੇਤੁ ਬਿਧਾਤੈ ॥[18]
गुरमुखि बांधिओ सेतु बिधातै ॥
एक सेतु उद्देश्य होता है दो खंडो
को जोड़ना और यह निश्चित करना की एक यात्री की यात्रा बिना किसी अवरोध जैसे घाटी, नदी का सामना
किए बिना सरलता से पूर्ण हो जाए।
उसी प्रकार गुरु की कृपा से गुरमुख का भाग्य उदय होता है और वो नश्वर
प्राणियों और
'अकाल पुरख'
के बीच एक सेतु का कार्य करता है। वो जानता है इस संसार रूपी भाव सागर को पार करने के लिए एक
मनुष्य अनंत व्यसनों का सामना करना पड़ता
है। तो वो
एक सेतु बनकर,
मन में
'अकाल पुरख के नाम'
की ज्योत जागकर इन बाधाओं को पार करने में सहायक होता है। उसका यह कर्म
निस्वार्थ होता है।
१.१३
दूसरों को प्रेरित करता है
जब कभी मनुष्य अपने जीवन में
मानसिक रूप से परेशान होता है,
उसे लगता है की अब कोई आशा नहीं बची, वो टूट जाता है और उसे लगता है की वो अपनी परिस्थितियों को
नहीं बदल सकता,
तब उसे आवश्यक्ता होती है किसी के साथ की। ये साथी उसके
लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाता है और उसे प्रोत्साहित करता है सभी बाधाओं के
विरुद्ध लड़ने के लिए।
यहाँ एक बात विचार करने योग्य है की मनुष्य वो साथी केवल अपने सांसारिक
मित्रों और प्रियजनों में ढूँढ़ता है। लेकिन उनका सामर्थ्य भी सीमित है। इसलिए एक ऐसे
साथी का साथ आवश्यक है जो ना केवल उसकी परिस्थितियों को बदल सके अपितु अंतिम समय
में भी साथ ना छोड़े।
और ऐसे साथी तो केवल
'अकाल पुरख'
ही है।
ਅੰਤ ਬਾਰ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਜੀ ਕੋਊ
ਕਾਮਿ ਨ ਆਇਓ ॥[19]
अंत बार नानक बिनु हरि जी कोऊ कामि न आइओ ॥
तो गुरमुख एक मित्र बनकर मनुष्य को प्रेरित करता है:
१.१३.१ अकाल पुरख से मिलन और अकाल पुरख का नाम जपने
के लिए
ਗੁਰਮੁਖਿ
ਮਿਲੈ ਮਿਲਾਏ ਆਪੇ ॥[20]
गुरमुखि
मिलै मिलाए आपे ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਘਾਲੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖਟੇ
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪਾਏ ॥[21]
गुरमुखि घाले गुरमुखि खटे गुरमुखि नामु जपाए ॥
जो ‘अकाल पुरख’ में लीन है तो
इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए की उसका मिलन 'उससे' हो चुका है। इसके चलते
गुरमुख, 'अकाल
पुरख' की
कृपा से 'अकाल
पुरख' के गुण
धारण करता है।
धन श्री गुरु नानक देव जी ने
'अकाल पुरख'
को ‘निरवैर’ यानि बिना किसी से शत्रुता रखने वाला कहकर सम्बोधित किया है। यही गुण गुरमुख
को भी निस्वार्थ बना देता है।
उसकी इच्छा यही होती है की सबका मिलन 'अकाल पुरख' से हो और वो
अपना जीवन इस प्रकार जीता है की वो ‘अकाल पुरख’ से मिलन और ‘अकाल पुरख’ का नाम
जपने के लिए सबको प्रेरित करता है।
१.१३.२ अच्छे कर्म करने के लिए
ਗੁਰਮੁਖਿ
ਕਰਣੀ ਕਾਰ ਕਰਾਏ ॥[22]
गुरमुखि करणी कार कराए ॥
सिखी के अनुसार मनुष्य की वास्तविक
पहचान उसकी जात या उसकी सामाजिक दर्जे से नहीं अपितु उसके कर्मों से होती है। कर्म अगर
पवित्र हैं तो उसका दर्जा ऊपर है क्योंकि उसका ध्यान 'अकाल पुरख' पर केंद्रित है। अगर कर्म अच्छे
नहीं हैं तो वो माया और द्वन्द में लिप्त केवल एक निम्न कोटि का कीट है[23]। गुरमुख ने अपनी
उच्च अवस्था अच्छे कर्मों के कारण प्राप्त की है। और वो दूसरों
को भी यही प्रेरणा देता है की अच्छे कर्मों द्वारा ही 'अकाल पुरख' की प्राप्ति और
मुक्ति संभव है।
१.१३.३
अकाल पुरख का मूल्यांकन करने के लिए
ਗੁਰਮੁਖਿ
ਤੋਲਿ ਤੋੁਲਾਵੈ ਤੋਲੈ ॥[24]
गुरमुखि तोलि तोलावै तोलै ॥
‘अकाल पुरख’ ने
मनुष्य को विवेक की दात प्रदान की है। यह विवेक उसे सही और गलत की पहचान करने की क्षमता प्रदान
करता है। किन्तु
मनुष्य इस विवेक के आधीन हो कर तार्किक हो जाता है। और ‘अकाल पुरख’
के आस्तित्व पर ही प्रश्न लगा देता है। वो ‘अकाल पुरख’ का मूल्यांकन करने लगता है। गुरमुख को
ज्ञात है की ‘अकाल पुरख’ अतोल[25] है । उसके गुण अनंत
हैं इतने अनंत की उन सबको मात्र शब्दों में उजागर नहीं किया जा सकता[26]। और वो यह भी
जानता है की दुर्भाग्यवश तार्किक जीव अपने सीमित दृष्टिकोण के कारण 'अकाल पुरख' को बिना
मूल्यांकन किये नहीं मानेगा।
इसलिए गुरमुख गुरबाणी की सहायता से प्रेरित करता है की सब 'उसके' गुणों को जाने
और इसके चलते वो ‘अकाल पुरख’ और मनुष्यों के बीच बंधन स्थापित करता है।
१.१४
अमर है और सांसारिक सुखों एवं दुखों से दूर है
ਸੁਖ
ਦੁਖ ਹੀ ਤੇ ਅਮਰੁ ਅਤੀਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਜ ਘਰੁ ਪਾਇਦਾ ॥੮॥[27]
सुख दुख ही ते अमरु अतीता गुरमुखि निज घरु पाइदा ॥८॥
गुरमुख अमर है। इसका अर्थ यह नहीं है की उसके शरीर का कभी अंत नहीं होगा। हर प्राणी की देह नश्वर है। इसका अर्थ यह है की अपनी उच्च आधयात्मिक अवस्था के चलते उसने जीवन मरण के चक्र को तोड़ कर रख दिया है। उसके अंतर्मन से मृत्यु और यमदूतों का भय समाप्त हो गया है। उसके अंतर्मन में अब केवल 'नाम' विद्यमान है। उसके कर्म इतने महान हो चुके हैं कि उसकी महानता चिर काल तक रहेगी। अब कोई भी सांसारिक दुःख या सुख उसे छू नहीं सकता। उसने भव सागर लाँघ लिया है।
जारी है - गुरमुख गुरु साहिबान के अनुभव भाग १
[1] पउड़ी - अंग
६४८ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (धन श्री गुरु राम दास जी)
[2] आसा महला
४ - अंग १२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[3] ਬਾਣੀ ਗੁਰੂ ਗੁਰੂ ਹੈ ਬਾਣੀ ਵਿਚਿ ਬਾਣੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਾਰੇ ॥
बाणी गुरू गुरू है बाणी विचि बाणी अम्रितु
सारे ॥
नट महला ४ - अंग ९८२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[4] सिरी राग
महला ४ - अंग ४० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[5] सिरी राग
महला ४ - अंग ४० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[6] माझ महला
३ - अंग १२६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[7] सूही महला
३ - अंग ७५७ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[8] रामकली महला ४ - अंग ८८१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[9] बिलावल महला ३ - अंग ७९७ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[10] राग आसा महला ३ असटपदीआ घर ८ काफी-अंग ४२४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[11] रामकली महला १ सिद्ध गोसट - अंग ९४६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[12] मारू महला ४ - अंग ९९५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[13] मारू महला ४ - अंग ९९५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[14] माझ महला ३ - अंग १२५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[15] मारू महला १ - अंग १०२४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[16] पउड़ी - अंग २५१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (धन श्री गुरु अर्जन देव जी)
[17] महला ५ –
अंग ४६३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[18] रामकली महला १ सिद्ध गोसट - अंग ९४२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[19] सोरठि महला ९ - अंग ६३४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[20] माझ महला ३ - अंग १२४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[21] राग सूही महला ३ घर १ अष्टपदियाँ - अंग ७५३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[22] रामकली महला १ सिद्ध गोसट - अंग ९४२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[23] ਦੂਜੈ ਲਗੇ ਪਚਿ ਮੁਏ ਮੂਰਖ ਅੰਧ ਗਵਾਰ ॥ ਬਿਸਟਾ ਅੰਦਰਿ ਕੀਟ ਸੇ ਪਇ
ਪਚਹਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥
दूजै लगे पचि मुए मूरख अंध गवार ॥
बिसटा अंदरि कीट से पइ पचहि वारो वार ॥
महला ३ - अंग ८५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[24] रामकली महला १ दखणी ओअंकार - अंग ९३२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[25] ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਿਕਟਿ ਵਸੈ ਸਭ ਜਗ ਕੈ ਅਪਰੰਪਰ ਪੁਰਖੁ ਅਤੋਲੀ ॥
हरि हरि निकटि वसै सभ जग कै
अपर्मपर पुरखु अतोली ॥
महला ४ गउड़ी पूरबी - अंग १६९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[26] ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਕਉਣੁ ਜਾਣੈ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ॥
मेरे साहिबा कउणु जाणै गुण तेरे ॥
गउड़ी चेती महला १-अंग १५६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[27] मारू महला १ - अंग १०३७ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
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