Sunday, October 5, 2025

17.2.2 गुरमुख - गुरु साहिबान के अनुभव भाग ३

 जारी है यहाँ से - गुरमुख: गुरु साहिबान के अनुभव भाग २

२.११ अकाल पुरख के दर्शन

ਮੁਖਿ ਧਿਮਾਣੈ ਧਨ ਖੜੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਖੀ ਦੇਖੁ ॥[1]

मुखि धिमाणै धन खड़ी गुरमुखि आखी देखु ॥ 

आँखें सबसे प्रमुख संवेदनात्मक इन्द्रियों में से एक हैं। एक मानव इसके माध्यम से अधिकतम जानकारी प्राप्त करता है। हम मानते हैं कि आँखें कभी धोखा नहीं देती। हम स्वीकार करते हैं कि जो कुछ भी आँखों से देखा जाता है, उसे सत्य के रूप में माना जाता है। यही कारण है कि तार्किक मन अकाल पुरख की उपस्थिति को स्वीकार नहीं करते क्योंकि इसे शारीरिक आँखों से नहीं देखा जा सकता है, जब तक जीव आत्मा में अशुद्धता विद्यमान है। पर गुरमख गुरु की शरण में अकाल पुरख को अपने स्वयं की आँखों से देखता है| क्योंकि उसका मन शुद्ध हो चुका है|

२.१२ अकाल पुरख ही सब कुछ है

ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ਦੂਜਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥[2]

गुरमुखि जाता दूजा को नाही ॥

 

ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕੁ ਪਛਾਣੈ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣੈ ਦੂਜਾ ॥੧॥[3]

नानक गुरमुखि एकु पछाणै अवरु न जाणै दूजा ॥१॥ 

एक मनुष्य को अपने प्रियजनों पर निर्भर रहता है | उसे हमेशा उनके समर्थन और साथ की आवयश्कता होती है | यह सब सही लगता है परन्तु जैसा कि ऊपर अनुभाग २.७ में उल्लेख किया गया है, नश्वर जीवों की सीमाएँ होती हैं। इसके अलावा, मनुष्यों पर निर्भर रहने का परिणाम होता है आंतरिक ऊर्जा और धयान का केंद्रित न होना जो कठिन परिस्थितियों का सामना करने में उपयोगी नहीं होती। लेकिन गुरमुख हमेशा अकाल पुरख जो ‘’ है, उसी पर ध्यान केंद्रित रखता है। वह समझता है कि उसके अतिरिक्त कोई और नहीं है।

२.१३ अकाल पुरख की कृपा

ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਖਾਈ ॥[4]

गुरमुखि नदरि निहालि मन मेरे अंतरि हरि नामु सखाई ॥

हम मनुष्य जीवन में कई बार असहाय महसूस करते हैं। और तब हम शक्ति की तलाश करते हैं। हम मानते हैं कि एक शक्तिशाली व्यक्ति का आशीर्वाद मिलने से हम अपने जीवन की सभी कठिनाइयों का सामना कर सकेंगे। परन्तु मनुष्य जितना शक्तिशाली होता जाता है वह उतना ही स्वार्थी बन जाता हैं। अगर किसी तथाकथित शक्तिशाली व्यक्ति ने किसी को समर्थन देने का निर्णय लिया है, तो यह सुनिश्चित नहीं है कि उसका यह कदम निस्वार्थ होगा। इसमें बहुत उच्च संभावना है कि यह एक स्वार्थपूर्ण कार्य होगा और जब पल आएगा, वह असहाय मनुष्य की दशा का लाभ उठाएगा। इस तरह असहाय मनुष्य को हमेशा इस बात की चिंता लगी रहती है कि एक दिन वह शोषित होगा। लेकिन गुरमुख असहाय अवस्था में अकाल पुरख को खोजता हुआ उसकी शरण में चला जाता है | उसे अकाल पुरख आशीर्वाद मिलता है | और यह गुरमुख को निर्भीक बनाता है क्योकिं ‘निरभउ’ अकाल पुरख का ही गुण है | और इस प्रकार गुरमुख, अकाल पुरख का नाम, सहायता और समर्थन अपने अंतर्मन में पाता है।

२.१४ अकाल पुरख के नाम की चाह

ਗੁਰਮੁਖਿ ਲੇਹੁ ਮਿਲਾਇ ਜਨੁ ਪਾਵੈ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ॥[5]

गुरमुखि लेहु मिलाइ जनु पावै नामु हरि ॥

 

ਅਨਦਿਨੁ ਅਨਦੁ ਹੋਵੈ ਮਨਿ ਮੇਰੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਾਗਉ ਤੇਰਾ ਨਾਮੁ ਨਿਵਾਜਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥[6]

अनदिनु अनदु होवै मनि मेरै गुरमुखि मागउ तेरा नामु निवाजा ॥१॥ रहाउ ॥ 

मनुष्य का मन चंचल है और इसमें अंतहीन इच्छाएँ वास करती हैं। ये इच्छाएँ मनुष्य के मन की अशुद्धता से उत्पन्न होती हैं | ये मनुष्य को अपनी इन्द्रियों का सेवक बना देती हैं | सीमित से अनंत कैसे प्राप्त किया जा सकता है? और मनुष्य अचेतन अवस्था में इन्द्रियों के रस की और अधिक मांग करता है। इन्द्रियों को भोगने के बाद भी उसका मन कभी आनंदित या संतुष्ट नहीं होता। इससे वह और भी कठोर बन जाता है। लेकिन गुरमुख विनम्र बन जाता है और अकाल पुरख से मिलन की प्रार्थना करता है और अकाल पुरख उसे अपने नाम से आशीर्वादित करता है। इससे गुरमुख का अंतर्मन आनंद से भर जाता है।

२.१५ अकाल पुरख के प्रेम का रंग

ਗੁਰਮੁਖਿ ਰੰਗੁ ਭਇਆ ਅਤਿ ਗੂੜਾ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਭੀਨੀ ਮੇਰੀ ਚੋਲੀ ॥੧॥[7]

गुरमुखि रंगु भइआ अति गूड़ा हरि रंगि भीनी मेरी चोली ॥१॥

 

ਗੁਰਮੁਖਿ ਰੰਗਿ ਚਲੂਲਿਆ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਤਨੋ ਭਿੰਨਾ ॥[8]

गुरमुखि रंगि चलूलिआ मेरा मनु तनो भिंना ॥ 

मानव विकास में मूल दोष यह रहा है कि हमने पुरुष और महिला के बीच प्रेम पर अत्यधिक बल दिया है। इसे इस तरह दर्शाया गया है कि भावनाएं उत्पन्न हों और नश्वर प्रेम को पीढ़ी दर पीढ़ी महानतम बना दिया। दुर्भाग्यवश कुटिलता इसे दूषित करती चली गयी | मनुष्यता उनमें इतनी डूब गयी की उसे और किसी की बुद्ध न रही | और धीरे-धीरे मनुष्यता का आध्यात्मिक पतन होने लगा और वो अकाल पुरख से दूर होने लगा | कुटिलता ने सभी प्रकार के मानवीय सम्बंधों को भी स्वार्थी बना दिया | इसलिए धन श्री गुरु तेग बहादुर जी ने निम्नलिखित शब्द उचरे हैं:

ਜਗਤ ਮੈ ਝੂਠੀ ਦੇਖੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥

ਅਪਨੇ ਹੀ ਸੁਖ ਸਿਉ ਸਭ ਲਾਗੇ ਕਿਆ ਦਾਰਾ ਕਿਆ ਮੀਤ॥੧॥ਰਹਾਉ॥[9]

जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥

अपने ही सुख सिउ सभ लागे किआ दारा किआ मीत॥१॥रहाउ॥ 

लेकिन गुरमुख गुरु की कृपा से यह समझने लगता है की केवल भक्त और अकाल पुरख के बीच का प्रेम ही अटल सत्य है| अन्य सब प्रेम व्यर्थ हैं और उसे अकाल पुरख से दूर कर देंगे| इसलिए वह यह अरदास करता है की वो केवल अकाल पुरख के प्रेम में ही रंग जाए | यह रंग इतना गहरा और पक्का होता है की एक बार यह चढ़ गया तो कोई भी रंग इसे उतार नहीं सकता| और गुरमुख इस अनंत प्रेम में भीग जाता है|

२.१६ अमृत पान

ਆਪੇ ਸੇਵ ਬਣਾਈਅਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ॥[10]

आपे सेव बणाईअनु गुरमुखि आपे अम्रितु पीआ ॥

 

ਨਾਮੁ ਰਸਾਇਣੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਇਣੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵਾਂ ਜੀਉ ॥੩॥[11]

नामु रसाइणु मनु त्रिपताइणु गुरमुखि अम्रितु पीवां जीउ ॥३॥

 

ਸ੍ਰਵਣੀ ਸੁਣੀ ਤ ਇਹੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵਾ ॥[12]

स्रवणी सुणी त इहु मनु त्रिपतै गुरमुखि अम्रितु पीवा ॥ 

अमर होना मानव जगत की एक बहुत तीव्र इच्छा है। मानव हमेशा से अमरता की कामना करता है, यह जानते हुए कि मृत्यु अंततः उसके शरीर को समाप्त कर देगी। लेकिन फिर भी वह इसके लिए तरसता है। वह अमर होना चाहता है और अमृत की खोज में लगा रहता है। न केवल मनुष्य, अपितु देव और मुनि भी अमृत की तलाश करते रहते हैं। इस बात का वर्णन धन श्री गुरु अमरदास जी ने निम्नलिखित शब्दों में किया है:

ਸੁਰਿ ਨਰ ਮੁਨਿ ਜਨ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਖੋਜਦੇ ਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ॥[13]

सुरि नर मुनि जन अमृतु खोजदे सु अमृतु गुर ते पाइआ ॥ 

अकाल पुरख की आज्ञा के कारण गुरमुख अकाल पुरख की सेवा में लीन हो जाता है | और गुरु की कृपा से गुरमुख यह सब समझता है | उसे अमृत की दात मिलती है | वो नाम रूपी अमृत का पान करता है जो उसके चित को शांत करता है और उसके मन को अनंत आनंद प्राप्त होता है |

२.१७ वास्तविक जीवन को पाना

ਜੀਵਨੋ ਮੈ ਜੀਵਨੁ ਪਾਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਾਏ ਰਾਮ ॥[14]

जीवनो मै जीवनु पाइआ गुरमुखि भाए राम ॥ 

मनुष्य के लिए पहचान इतनी महत्वपूर्ण है कि वह अपना सम्पूर्ण जीवन अपनी पहचान बनाने में बिता देता है। वास्तव में जो वह बनना चाहता है, वही उसके जीने की विधि अर्थात जीवन बन जाता है। परन्तु सवाल यह है कि क्या यह वास्तविकता है या वह केवल दर्पण में दिखने वाली छवियाँ? दूसरे शब्दों में, जो वह वास्तविक समझ के अनुभव करता है, क्या वह सच में वास्तविक है? दुर्भाग्य से उसे पता ही नहीं चलता की वो एक छलावे[15] में अपन जीवन व्यतीत कर रहा है | जब तक उसे समझ आता है तब तक उसके माथे पर यमदूत यमदण्ड[16] से प्रहार कर चुके होते हैं | अंत में केवल ऐसा जीवन केवल पीड़ा और ग्लानि लेकर आता है। परन्तु गुरु की कृपा से, गुरमुख जीवन की वास्तविकता को महसूस करता है | और जान जाता है की वास्तिवक जीवन अकाल पुरख की इच्छा को स्वीकार करने में है। और गुरमुख इस सत्य को अपने चित में बसा लेता है।

जारी है


[1] मारू महला - अंग १०१० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[2] माझ महला ३ - अंग १२२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[3] राग सूही छंत महला ४ घर ३ - अंग ७७५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[4] वडहंस महला ३ - अंग ५६९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[5] पउड़ी - अंग ७९० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (धन श्री गुरु अमर दास जी)

[6] बिलावल महला ३ - अंग ७९८ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[7] महला ४ गउड़ी पूरबी - अंग १६८ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[8] आसा महला ४ छंत घर ४ - अंग ४४८ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[9] देवगंधारी महला ९ - अंग ५३६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[10] पउड़ी - अंग ५५१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (श्री गुरु राम दास जी)

[11] माझ महला - ५ अंग ९९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[12] धनासरी छंत महला ४ घर १ - अंग ६९० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[13] रामकली महला ३ अनंदु - अंग ९१८ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[14] राग आसा छंत महला ४ घर १ - अंग ४४२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

 

[15] ਮ੍ਰਿਗ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਿਉ ਝੂਠੋ ਇਹੁ ਜਗ ਦੇਖਿ ਤਾਸਿ ਉਠਿ ਧਾਵੈ ॥੧॥

म्रिग त्रिसना जिउ झूठो इहु जग देखि तासि उठि धावै ॥१॥

गउड़ी महला ९ - अंग २१९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[16] ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਤਬ ਹੀ ਨਰੁ ਜਾਗੈ ॥ ਜਮ ਕਾ ਡੰਡੁ ਮੂੰਡ ਮਹਿ ਲਾਗੈ ॥੩॥੨॥

कहु कबीर तब ही नरु जागै ॥ जम का डंडु मूंड महि लागै ॥३॥२॥

गोंड - अंग ८७० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (भक्त कबीर जी)


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