रिक्त थी झोली, खाली थे हाथ,
केवल थी हीनता, और कुछ नहीं था पास।
खटखटाए दर कई, चाह थी कोई थामे बाँह,
सुनकर व्यथा हमारी, बंद हो गए सभी किवाड़।
हताश होकर चल पड़े, लेकर अपना पिटारा,
आ पहुँचे द्वार पर ‘तेरे’, कि सुना था यश ‘तुम्हारा’।
प्रेम का अनंत सिंधु, जग था कहता ‘तुम्हें’,
केवल दो बूंद की, थी पिपासा भी हमें।
लालसा ना थी मोती की, बुझती कहाँ है क्षुब्धा ‘अर्थ’ से,
अभिलाषा ना थी कंचन की, प्यासे थे तो सिर्फ स्नेह के।
लगा दिया डेरा, समीप आँगन के ‘तेरे’,
आशा थी मन मे यही, आर्द नेत्रों से करे दर्शन ‘तेरे’।
‘तुम’ हो गए दयाल, दशा हमारी जानकर,
विस्मय में बीते वो क्षण, ओ! भावों के जलधर।
एकांत में बिताए वो पल, बन गए संग्रह तेरी यादों का,
कुछ मुस्कान कुछ अश्रु, कुछ पूर्ण कुछ अधूरा। ‘तरुण’

Very inspiring words engulfed with emotions 🙏
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