मन की यह कैसी दशा है
विचारों से रिक्त भावों से भरा है
ना माणिक की चाह है ना कंचन की
चाह है तो 'अद्वितीय' आलिंगन की
ढोल नगाड़े प्रत्यक्ष है बजते
पर ढूंढता है चुप्पी ये
नाकार रहा है स्वांग से भरी हर प्रशंसा
बनाना चाहता है कूकर 'उस अनुपम' दर का
मान - सम्मान को समझ रहा है मिथ्या
छूना चाहता है 'पवित्र' मृतिका
व्यर्थ कर्मों से ग्रस्त इस जग में
बो रहा है बीज प्रार्थना के
कृत्रिम अँधेरों में अत्यधिक भटका है
अब 'प्रकाश' की खोज में है
सांसारिक क्रंदन त्याग के सारे
दो अश्रुओं को अब ये तड़पे
कर जागृत अग्नि विरह की
जगा पिपासा अमृत की
रख आशा 'अनंत' के दर्शनों की
टटोल रहा है 'अनहद बाणी'
बन गयी है अब यही
दशा इस मन की | 'तरुण'

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