यह
सुनने में कितना विचित्र लगता है की गुरु साहिबानों ने गुरबाणी में स्वयं को गुरुमुख
कह कर सम्बोधित किया है | जो स्वयं अकाल रूप है, गुरु है वो गुरमुख कैसे हो सकता है?
तो यह समझने के लिए कुछ तथ्य जान लेना आवश्यक है |
1. धन
श्री गुरु नानक देव जी ने सारी मानवता को ‘ੴ’ के साथ जुड़ने का सन्देश दिया
| वो दृढ़ करवाने चाहते थे की अकाल पुरख निरंकार है और मनुष्यता कहीं देह, जो की नश्वर
है, उसमें उलझ के नहीं रह जाए | धन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने तो यहाँ तक कहा है
की जो मनुष्य उनको ईश्वर कहेगा वो नर्क कुंड में जाएगा | गुरु साहिबान यह संदेश भी
देना चाहते थे की सभी ‘दातें’ अकाल पुरख की देन हैं और इसलिए मानवता को निरंकार से
जोड़ने के लिए गुरबाणी में उन्होंने स्वयं को गुरमुख कहकर सम्बोधित किया है |
2. सिख
गुरु का ध्यान करता है
क्योंकि वो गुरु के प्रति समर्पित है | गुरु यह भली भांति जानता है | गुरु उसकी प्रत्येक
मानसिक अवस्था से परिचित है | इसलिए उसको प्रेरित करने के लिए गुरु स्वयं को गुरमुख
कहकर सम्बोधित करता है | उसे दृढ़ करता है की गुरमुख बनकर ही गुरु का सच्चा सिख बना
जा सकता है |
3. सिखी
में विनम्रता का विशेष स्थान है | और अगर अकाल पुरख का हुकुम
मानना है तो बिना विनम्रता को धारण किए संभव नहीं है |उसके लिए आवश्यक है की सिख के
मन में कहीं से भी किसी भी प्रकार का अहं नहीं आ जाए| इसलिए गुरु साहिबानों ने अपने
को केवल गुरमुख ही नहीं अपितु ‘नीच कर्म करने वाला’,
‘निम्न कोटि का कीट’,
‘महा पापी’,
‘कूकर’
आदि कहकर भी अपने को सम्बोधित
किया है| विचार करने वाली बात है की अगर गुरु जो अकाल पुरख का स्वरुप है अगर वो अपने
को ऐसे सम्बोधित करता है तो सोचिए एक सिख की क्या अवस्था होगी? यह सुनिश्चित करेगा
की सिख का अहं नियत्रण में रहे|
यही
है सतगुरु की महानता जो अपने को नहीं अपने सिखों को आगे रखता है | और अपने सिखों का
हर क्षण ध्यान रखता है | तो आइए जानने का प्रयास करें की कैसे गुरु साहिबानों ने स्वयं
को गुरमुख सम्बोधित कर अपने अनुभवों को प्रकट किया है?
ਤ੍ਰਿਭਵਣੁ ਖੋਜਿ ਢੰਢੋਲਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥
त्रिभवणु
खोजि ढंढोलिआ गुरमुखि खोजि निहालि ॥
मनुष्य
ना जाने किन - किन स्थानों पर जाकर अकाल पुरख की खोज करता है? वो ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा
देता है, यहाँ तक की वो अकाल पुरख की खोज तीनों लोकों में करता है | हो सकता है उसकी
भावना या प्रयासों में कोई भी कमी ना हो लेकिन उसे अकाल पुरख की प्राप्ति गुरमुख बनने
के उपरांत ही होती है | अर्थात गुरबाणी के साथ जुड़ने से|
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਜਾਣਿਆ ਗੁਰਿ ਮੇਲੀ ਤਰੀਆਸੁ ॥੧॥
गुरमुखि
अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥१॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋਤਿ
ਨਿਰੰਤਰਿ ਪਾਈ ॥
गुरमुखि
जोति निरंतरि पाई ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਆਪੁ
ਪਛਾਣੈ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਏ ॥੩॥
गुरमुखि
बूझै आपु पछाणै सचे सचि समाए ॥३॥
ਮੈ ਨਿਰਖਤ ਨਿਰਖਤ
ਸਰੀਰੁ ਸਭੁ ਖੋਜਿਆ ਇਕੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚਲਤੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥
मै
निरखत निरखत सरीरु सभु खोजिआ इकु गुरमुखि चलतु दिखाइआ ॥
मनुष्य
के अंतर्मन में अकाल पुरख और ‘उसकी’निधियों का वास है| गुरबाणी के अनुसार इसमें चमत्कारिक
और अद्भुतताएं भी निवास करती हैं| जिनको खोज लेने पर मनुष्य का मिलन सत्य से हो जाता
है|पर उसके अंतर्मन में विकार,
अंधकार,
संघर्ष,
द्वन्द,
पीड़ा,
अगन,
प्यास,
झूठा अभिमान,
लोभ,
भ्रम और मोह
भी बसते हैं | अगर मनुष्य को अपने को जानना है तो उसे इन सबका का ज्ञान होना चाहिए
अन्यथा उसका आंतरिक ज्ञान केवल छलावा है | गुरमुख गुरु आज्ञा का पालन करते हुए इन सब
को समझने लगता है | गुरु की शरण में वो प्रयास करता है अपनी कमियों को दूर करने की
और अंत में उसका मिलन अकाल पुरख से होता है और वो भाव सागर लाँघ जाता है |
ਹਰਿ ਕੀਰਤਿ ਰਹਰਾਸਿ ਹਮਾਰੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪੰਥੁ ਅਤੀਤੰ ॥੩॥
हरि
कीरति रहरासि हमारी गुरमुखि पंथु अतीतं ॥३॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਗੁਣ
ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥੧॥
गुरमुखि
हरि गुण आखि वखाणी ॥१॥
ਹਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ
ਸਲਾਹੀ ਗੁਰ ਕਉ ਵਾਰਿਆ ॥੧॥
हउ
गुरमुखि सदा सलाही गुर कउ वारिआ ॥१॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਨਾਮੁ
ਧਿਆਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੫॥
जनु
नानकु नामु धिआए गुरमुखि गुण गाइदा ॥५॥
भोजन,
वस्त्र और घर को इस संसार में प्राथमिक आवयश्कताएँ कहा गया है | इनकी पूर्ती करने के
लिए मनुष्य को धन कमाना पड़ता है | और धन कमाना तभी संभव है जब मनुष्य कोई व्यवसाय करे
या किसी कौशल में निपुण हो | कई बार मनुष्य का लोभ इतना बढ़ जाता है की वो धन एकत्र
करने को ही मनुष्य जीवन को अपना लक्ष्य समझ लेता है और गलत तरीकों से धन कमाने लग जाता
है | ऐसा करने से उसके अंदर की पवित्रता समाप्त हो जाती है | चाहे उसने कितना ही धर्म
ही क्यों ना कमाया हो सब व्यर्थ हो जाता है | परन्तु गुरमुख जानता है की मनुष्य का
लक्ष्य है अकाल पुरख से मिलन और वो अकाल पुरख का कीर्तन को की अपना पेशा और धर्म मानता
है | वो कोई भी क्षण व्यर्थ नहीं करता और केवल अकाल पुरख के चिंतन में डूबा रहता है
| अकाल पुरख का कीर्तन और चिंतन उसे पवित्रता प्रदान करती है |
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
गुरमुखि
रामु मेरै मनि भाइआ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵੇਖਾ ਤਾ
ਇਹੁ ਮਨੁ ਭਿੰਨਾ ॥
गुरमुखि
वेखा ता इहु मनु भिंना ॥
मनुष्य का मन चंचल है
| इतना चंचल की वो अपने को आनंदित करने के लिए ना जाने कहाँ - कहाँ भटकता रहता है,
कभी विचारों में तो कभी व्यर्थ के क्रियाओं में | वो आनंद के लिए जिन तत्वों पर निर्भर
है वह सभी सीमित हैं | इसलिए मन कभी भी संतुष्ट नहीं होता और अपना सब कुछ निरर्थक कर्मों
में ही नष्ट कर देता है | उसकी आनंद भोगने की चाह तो अनंत होती पर स्रोत और माध्यम
सीमित | परन्तु गुरमुख गुरु की कृपा से अकाल पुरख में लीन अनंत सुख
प्राप्त करता है| अकाल पुरख तो अनंत है ही, वो गुरमुख को अनंत आनंद अनुभव करने के योग्य
बना देता है | और इस तरह गुरमुख का मन अकाल पुरख की संगत में प्रसन्न रहता है| अकाल
पुरख के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं भाता |
रामकली महला १ सिद्ध गोसट - अंग ९३८ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी