Tuesday, September 30, 2025

21. हिंदी कविता - आगमन अवश्य होगा



आगमन होगा उस तट का

थम जाएंगे तूफ़ान जहाँ

जो रह - रह कर उठते हैं

इस मन रुपी सागर में

आगमन होगा उस शिखर का

पीड़ा का अंत होगा जहाँ

जो एहसास कराती है

भटका प्राणी हूँ मैं

आगमन होगा उस गंतव्य का

खो देगा गति समय जहाँ

जो शत्रु है सबसे बड़ा

कराता है एहसास परिवर्तन का

आगमन होगा उस गहनता का

अहम् नहीं रहेगा जहाँ

जो है केवल एक मिथ्या 

बीजता है अंकुर विष का

आगमन होगा उस असीमता का

सीमा ना रहेगी कोई जहाँ

जो बाँधती है मोह पाश की बेड़ियाँ

छीन लेती है स्वत्रंता

आगमन होगा उस स्थल का

संग्रह है सत्य का जहाँ

विसमाद से भरा हुआ

और जहाँ रहता है स्वामी 'नौ निधियों' का

एक पल वहाँ अवश्य पहुंचेगें

नाचते गाते हर्ष में झूमते | 'तरुण'

Sunday, September 28, 2025

20. The Fractured Soul


It is universally accepted fact that every physical entity has a beginning and an end. And these two events are referred as Birth and Death in case of living entities. Birth of living organism happens when organic molecules combined together, and Death happens when they decay to an extent not to hold a life. Thus, Death results in ‘Fracturing’ of tissues into molecules which once came together to form a life.

But our Spiritual Beliefs remind us that every life form has something which Death can’t touch. We know it as ‘Soul’. And it just changes physical manifestation after death[1]. But if death can’t touch it how a soul can ever be fractured? After all, ‘Soul’ is neither matter nor physical. But the title of this work suggests ‘Something, The Soul’ is ‘Fractured’. A fracture in tissue of living organism may cause pain for life but if ‘Soul’ is fractured it can continue to hurt till eternity if it does not heal.

As per rational beliefs ‘Soul’ does not exist as it is not tangible. Hence, it does not make sense to have notion of ‘Fractured Soul’. Rationality further tells us that only matter or physical can be fractured. And that’s why we accept the well-known principle that:

“Energy can neither be created nor DESTROYED.”

So, will it be safe to assume that ‘Soul’ is non-matter; a piece of energy; a meta physical entity. And this understanding matches with the pieces of knowledge available to us in almost all religious beliefs. But the question still remains, if ‘Soul’ is meta-physical how it can be ruptured?

To answer this question, it is important for us to revisit how the universe was born. We will address this question in lieu of well accepted theory of ‘Big Bang’. Big Bang states that universe was born with a release of huge amount of energy and light[2]. And many entities were formed including matter, which were thrown away in all directions because of ‘Big Bang Explosion’.

It should be safe to assume that before ‘Big Bang’ every entity whether matter or non-matter or physical was contained in a ‘container[3]’. It can be further assumed that all were connected and were present in each other vicinity. And when entities got separated, each entity carried only a few characteristics of the container. The probability of any entity carrying all characteristics of container should be almost zero else we would have observed such containers in our universe. Since container was source of all the entities, let us call it ‘Source’ for further discussion.

Since, everything we comprehend came to existence after Big Bang, so it is safe to assume origin of ‘Soul’ similar to other observable entities. Thus, even soul got separated from source. And since source got fractured soul carried the same characteristic, hence the notion ‘The Fractured Soul’. This may seem as leap of faith but I just wanted to give an insight that we can’t negate the possibility of ‘The Fractured Soul’.

But the question is why ‘Fractured Soul’. The reason is to make human realize following:

·       We are separated[4] from ‘The Source’.

·       This separation[5] has made us to suffer and is the real reason behind our pains. And we need to determine, realize and accept it. That is our only hope for healing.

Fractures do happen and there are numerous ways a soul can be fractured. If we allow us to heal the separation will end. Source and Soul will become one again[6]. This mergence will take away all pains and sufferings.


[1] ਜੋਤਿ ਸਰੂਪ ਅਨਾਹਤ ਲਾਗੀ ਕਹੁ ਹਲਾਲੁ ਕਿਆ ਕੀਆ ॥੨॥

(The light of the soul passes into another form. So tell me, what have you killed?)

Ang 1350 - Dhan Guru Granth Sahib Ji

[2] Even in Gurbaani references are present which points towards Big Bang.

 ਜੋਤਿ ਕੀ ਜਾਤਿ ਜਾਤਿ ਕੀ ਜੋਤੀ

(The creation is born of the Light, and the Light is in the creation.)

Ang 325 - Dhan Guru Granth Sahib Ji

 ਏਕ ਨੂਰ ਤੇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਉਪਜਿਆ ਕਉਨ ਭਲੇ ਕੋ ਮੰਦੇ ॥੧॥

(From the One Light, the entire universe welled up. So who is good, and who is bad?)

Ang 1349 - Dhan Guru Granth Sahib Ji

 [3] As per different beliefs it is called:

·        A Nebula – Cloud (Scientific)

·        Primal Void or Primal Being (Mainly Religious Reference)

·        In Gurbani it is also referred to as even Cosmic Egg.

ਅੰਡਜ ਫੋੜਿ ਜੋੜਿ ਵਿਛੋੜਿ

(Breaking the cosmic egg, He united, and separated.)

Ang 839 - Dhan Shri Guru Granth Sahib Ji

[4] ਧੁਰਹੁ ਵਿਛੁੰਨੀ ਕਿਉ ਮਿਲੈ ਗਰਬਿ ਮੁਠੀ ਬਿਲਲਾਇ ॥੨॥

(Separated from the Primal Being, how can she meet with Him again? Plundered by pride, she cries out and bewails.)

Ang 60 - Dhan Guru Granth Sahib Ji

[5] ਅਨਿਕ ਜਨਮ ਬਿਛੁਰਤ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ

(Separated from You for countless incarnations, I have suffered in pain.)

Ang 750 - Dhan Guru Granth Sahib Ji

[6] This will ensure end to duality which is considered as one of the reasons for human sufferings.

Saturday, September 27, 2025

17.2 गुरमुख - गुरु साहिबान के अनुभव भाग १

 जारी है यहाँ से - गुरमुख कौन है?

यह सुनने में कितना विचित्र लगता है की गुरु साहिबानों ने गुरबाणी में स्वयं को गुरुमुख कह कर सम्बोधित किया है | जो स्वयं अकाल रूप है, गुरु है वो गुरमुख कैसे हो सकता है? तो यह समझने के लिए कुछ तथ्य जान लेना आवश्यक है |

1.      धन श्री गुरु नानक देव जी ने सारी मानवता को ‘’ के साथ जुड़ने का सन्देश दिया | वो दृढ़ करवाने चाहते थे की अकाल पुरख निरंकार है और मनुष्यता कहीं देह, जो की नश्वर है, उसमें उलझ के नहीं रह जाए | धन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने तो यहाँ तक कहा है की जो मनुष्य उनको ईश्वर कहेगा वो नर्क कुंड में जाएगा | गुरु साहिबान यह संदेश भी देना चाहते थे की सभी ‘दातें’ अकाल पुरख की देन हैं और इसलिए मानवता को निरंकार से जोड़ने के लिए गुरबाणी में उन्होंने स्वयं को गुरमुख कहकर सम्बोधित किया है |

2.      सिख गुरु का ध्यान करता है[1] क्योंकि वो गुरु के प्रति समर्पित है | गुरु यह भली भांति जानता है | गुरु उसकी प्रत्येक मानसिक अवस्था से परिचित है | इसलिए उसको प्रेरित करने के लिए गुरु स्वयं को गुरमुख कहकर सम्बोधित करता है | उसे दृढ़ करता है की गुरमुख बनकर ही गुरु का सच्चा सिख बना जा सकता है |

3.      सिखी में विनम्रता का विशेष स्थान है | और अगर अकाल पुरख का हुकुम[2] मानना है तो बिना विनम्रता को धारण किए संभव नहीं है |उसके लिए आवश्यक है की सिख के मन में कहीं से भी किसी भी प्रकार का अहं नहीं आ जाए| इसलिए गुरु साहिबानों ने अपने को केवल गुरमुख ही नहीं अपितु ‘नीच कर्म करने वाला’[3], ‘निम्न कोटि का कीट’[4], ‘महा पापी’[5], ‘कूकर’[6] आदि कहकर भी अपने को सम्बोधित[7] किया है| विचार करने वाली बात है की अगर गुरु जो अकाल पुरख का स्वरुप है अगर वो अपने को ऐसे सम्बोधित करता है तो सोचिए एक सिख की क्या अवस्था होगी? यह सुनिश्चित करेगा की सिख का अहं नियत्रण में रहे|

यही है सतगुरु की महानता जो अपने को नहीं अपने सिखों को आगे रखता है | और अपने सिखों का हर क्षण ध्यान रखता है | तो आइए जानने का प्रयास करें की कैसे गुरु साहिबानों ने स्वयं को गुरमुख सम्बोधित कर अपने अनुभवों को प्रकट किया है?

२.१ अकाल पुरख की प्राप्ति

ਤ੍ਰਿਭਵਣੁ ਖੋਜਿ ਢੰਢੋਲਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਨਿਹਾਲਿ ॥[8]

त्रिभवणु खोजि ढंढोलिआ गुरमुखि खोजि निहालि ॥ 

मनुष्य ना जाने किन - किन स्थानों पर जाकर अकाल पुरख की खोज करता है? वो ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देता है, यहाँ तक की वो अकाल पुरख की खोज तीनों लोकों में करता है | हो सकता है उसकी भावना या प्रयासों में कोई भी कमी ना हो लेकिन उसे अकाल पुरख की प्राप्ति गुरमुख बनने के उपरांत ही होती है | अर्थात गुरबाणी के साथ जुड़ने से|

२.२ अंतर्मन का ज्ञान

ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਜਾਣਿਆ ਗੁਰਿ ਮੇਲੀ ਤਰੀਆਸੁ ॥੧॥[9]

गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥१॥

 

ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਪਾਈ ॥[10]

गुरमुखि जोति निरंतरि पाई ॥

 

ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਏ ॥੩॥[11]

गुरमुखि बूझै आपु पछाणै सचे सचि समाए ॥३॥

 

ਮੈ ਨਿਰਖਤ ਨਿਰਖਤ ਸਰੀਰੁ ਸਭੁ ਖੋਜਿਆ ਇਕੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚਲਤੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥[12]

मै निरखत निरखत सरीरु सभु खोजिआ इकु गुरमुखि चलतु दिखाइआ ॥ 

मनुष्य के अंतर्मन में अकाल पुरख और ‘उसकी’निधियों का वास है| गुरबाणी के अनुसार इसमें चमत्कारिक और अद्भुतताएं भी निवास करती हैं| जिनको खोज लेने पर मनुष्य का मिलन सत्य से हो जाता है|पर उसके अंतर्मन में विकार[13], अंधकार[14], संघर्ष[15], द्वन्द[16], पीड़ा[17], अगन[18], प्यास[19], झूठा अभिमान[20], लोभ[21], भ्रम और मोह[22] भी बसते हैं | अगर मनुष्य को अपने को जानना है तो उसे इन सबका का ज्ञान होना चाहिए अन्यथा उसका आंतरिक ज्ञान केवल छलावा है | गुरमुख गुरु आज्ञा का पालन करते हुए इन सब को समझने लगता है | गुरु की शरण में वो प्रयास करता है अपनी कमियों को दूर करने की और अंत में उसका मिलन अकाल पुरख से होता है और वो भाव सागर लाँघ जाता है |

२.३ अकाल पुरख का कीर्तन

ਹਰਿ ਕੀਰਤਿ ਰਹਰਾਸਿ ਹਮਾਰੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪੰਥੁ ਅਤੀਤੰ ॥੩॥[23]

हरि कीरति रहरासि हमारी गुरमुखि पंथु अतीतं ॥३॥

 ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ॥੧॥[24]

गुरमुखि हरि गुण आखि वखाणी ॥१॥

 

ਹਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਸਲਾਹੀ ਗੁਰ ਕਉ ਵਾਰਿਆ ॥੧॥[25]

हउ गुरमुखि सदा सलाही गुर कउ वारिआ ॥१॥

 

ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗੁਣ ਗਾਇਦਾ ॥੫॥[26]

जनु नानकु नामु धिआए गुरमुखि गुण गाइदा ॥५॥

 

भोजन, वस्त्र और घर को इस संसार में प्राथमिक आवयश्कताएँ कहा गया है | इनकी पूर्ती करने के लिए मनुष्य को धन कमाना पड़ता है | और धन कमाना तभी संभव है जब मनुष्य कोई व्यवसाय करे या किसी कौशल में निपुण हो | कई बार मनुष्य का लोभ इतना बढ़ जाता है की वो धन एकत्र करने को ही मनुष्य जीवन को अपना लक्ष्य समझ लेता है और गलत तरीकों से धन कमाने लग जाता है | ऐसा करने से उसके अंदर की पवित्रता समाप्त हो जाती है | चाहे उसने कितना ही धर्म ही क्यों ना कमाया हो सब व्यर्थ हो जाता है | परन्तु गुरमुख जानता है की मनुष्य का लक्ष्य है अकाल पुरख से मिलन और वो अकाल पुरख का कीर्तन को की अपना पेशा और धर्म मानता है | वो कोई भी क्षण व्यर्थ नहीं करता और केवल अकाल पुरख के चिंतन में डूबा रहता है | अकाल पुरख का कीर्तन और चिंतन उसे पवित्रता प्रदान करती है |

२.४ अंतर्मन का आनंद

ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥[27]

गुरमुखि रामु मेरै मनि भाइआ ॥

 

ਗੁਰਮੁਖਿ ਵੇਖਾ ਤਾ ਇਹੁ ਮਨੁ ਭਿੰਨਾ ॥[28]

गुरमुखि वेखा ता इहु मनु भिंना ॥

 

मनुष्य का मन चंचल है | इतना चंचल की वो अपने को आनंदित करने के लिए ना जाने कहाँ - कहाँ भटकता रहता है, कभी विचारों में तो कभी व्यर्थ के क्रियाओं में | वो आनंद के लिए जिन तत्वों पर निर्भर है वह सभी सीमित हैं | इसलिए मन कभी भी संतुष्ट नहीं होता और अपना सब कुछ निरर्थक कर्मों में ही नष्ट कर देता है | उसकी आनंद भोगने की चाह तो अनंत होती पर स्रोत और माध्यम सीमित | परन्तु गुरमुख गुरु की कृपा से अकाल पुरख में लीन अनंत सुख[29] प्राप्त करता है| अकाल पुरख तो अनंत है ही, वो गुरमुख को अनंत आनंद अनुभव करने के योग्य बना देता है | और इस तरह गुरमुख का मन अकाल पुरख की संगत में प्रसन्न रहता है| अकाल पुरख के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं भाता |

जारी है - गुरमुख: गुरु साहिबान के अनुभव भाग २


[1] ਗੁਰ ਕੈ ਸਿਖਿ ਸਤਿਗੁਰੂ ਧਿਆਇਆ

गुर कै सिख सतिगुरु धिआइआ

राग गोंड अष्टपदियाँ महला घर - अंग ८६९ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[2] ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਚਲਣਾ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਨਾਲਿ ॥੧॥

हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नाल ॥੧॥

जपजी साहिब - अंग धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[3] ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਮ ਨੀਚ ਕਰੰਮਾ

कहु नानक हम नीच करमा

आसा महला - अंग १२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[4] ਹਮ ਕੀਰੇ ਕਿਰਮ ਸਤਿਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਕਰਿ ਦਇਆ ਨਾਮੁ ਪਰਗਾਸਿ ॥੧॥

हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नाम परगासि ॥੧॥

राग गूजरी महला - अंग १० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[5] ਹਉ ਪਾਪੀ ਤੂੰ ਨਿਰਮਲੁ ਏਕ ॥੧॥ ਰਹਾਉ

हउ पापी तूं निरमल एक ॥੧॥ रहाउ

गउड़ी महला - अंग १५३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[6] ਹਮ ਭੂਲ ਚੂਕ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਹੁ ਜਨ ਨਾਨਕ ਕੁਤਰੇ ਕਾਢੇ

हम भूल चूक गुर किरपा धारहु जन नानक कुतरे काढे

गउड़ी पूरबी महला - अंग १७० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[7] आप सब से एक विनती है की इन शब्दों का उपयोग यहाँ सिर्फ समझाने के लिए किया गया और प्रमाण गुरबाणी से दिए गए हैं | वरना हम जैसे नश्वर प्राणी गुरु साहिबानों के लिए इन शब्दों को सोच भी नहीं सकते लिखना और बोलना तो दूर की बात है | गुरु साहिबानों और आप सब से सच्चे दिल से क्षमा माँगता हूँ |

[8] सिरी राग महला - अंग २० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[9] सिरी राग महला - अंग ६३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[10] रामकली महला सिद्ध गोसट - अंग ९४० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[11] रामकली महला सिद्ध गोसट - अंग ९३८ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[12] बसंत हिंडोल घर महला - अंग ११९१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[13] ਅੰਤਰਿ ਮੈਲੁ ਨ ਉਤਰੈ ਧ੍ਰਿਗੁ ਜੀਵਣੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਵੇਸੁ ॥

अंतर मैल न उतरै ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वेसु ॥

सिरी राग महला १ - अंग २२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[14] ਮਨਮੁਖ ਹੀਅਰਾ ਅਤਿ ਕਠੋਰੁ ਹੈ ਤਿਨ ਅੰਤਰਿ ਕਾਰ ਕਰੀਠਾ

मनमुख हीअरा अति कठोरु है तिन अंतर कार करीठा ||

गउड़ी पूरबी महला - अंग १७१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[15] ਨਾਮੇ ਕੇ ਸੁਆਮੀ ਲਾਹਿ ਲੇ ਝਗਰਾ

नामे के सुआमी लाहि ले झगरा ||

राग आसा भगत नाम देव जी - अंग ४८५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[16] ਅੰਤਰ ਕੀ ਦੁਬਿਧਾ ਅੰਤਰਿ ਮਰੈ ॥੧॥

अंतर की दुबिधा अंतर मरै ॥੧॥

धनासरी महला - अंग ६६१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[17] ਹਮਰੀ ਬੇਦਨਿ ਤੂ ਜਾਨਤਾ ਸਾਹਾ ਅਵਰੁ ਕਿਆ ਜਾਨੈ ਕੋਇ ਰਹਾਉ

हमरी बेदनि तू जानता साहा अवरु किआ जाने कोइ रहाउ

धनासरी महला - अंग ६७० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[18] ਜਮੁ ਜਾਗਾਤਿ ਨਾਹੀ ਕਰੁ ਲਾਗੈ ਜਿਸੁ ਅਗਨਿ ਬੁਝੀ ਠਰੁ ਸੀਨਾ ਹੇ ॥੫॥

जमु जागति नाही करू लागै जिसु अगनि बुझी ठरु सीना हे ॥੫॥

मारू महला - अंग १०२७ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[19] ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਸ ਚਾਤ੍ਰਿਕ ਜਿਉ ਜਲ ਕੀ ਸਫਲ ਦਰਸਨੁ ਕਦਿ ਪਾਂਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ

अंतर पिआस चात्रिक जिऊ जल की सफल दर्शन कद पाऊँ ॥੧॥ ਰਹਾਉ

सारंग महला चउपदे घर - अंग १२०२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[20] ਕਰਹਿ ਸੋਮ ਪਾਕੁ ਹਿਰਹਿ ਪਰ ਦਰਬਾ ਅੰਤਰਿ ਝੂਠ ਗੁਮਾਨ

करहि सोम पाकु हिरह पर दरबा अंतर झूठ गुमान

सारंग महला - अंग १२०३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[21] ਬੈਸਨੌ ਨਾਮੁ ਕਰਤ ਖਟ ਕਰਮਾ ਅੰਤਰਿ ਲੋਭ ਜੂਠਾਨ

बैसनौ नामु करत खट करमा अंतरि लोभ झुठान

सारंग महला - अंग १२०२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[22] ਮਿਟੰਤਿ ਤਤ੍ਰਾਗਤ ਭਰਮ ਮੋਹੰ

मिटंत तत्रागत भरम मोहं

सलोक सहसकृति महला - अंग १३५४ श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[23] आसा महला - अंग ३६० धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[24] आसा महला - अंग ३६७ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[25] पउड़ी - अंग ६४२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (श्री गुरु राम दास जी)

[26] पउड़ी - अंग ६४४ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी (धन श्री गुरु राम दास जी)

[27] आसा महला - अंग ४१६ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[28] माझ महला - अंग १११ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[29] कृपया ध्यान दें की यहाँ सुख को अर्थ है आत्मिक ख़ुशी | इसे भौतिक या इन्द्रियों के सुख से ना जोड़े |

26. Baani Dhan Guru Arjan Dev Ji Ki: Ang 400 Dhan Guru Granth Sahib Ji

  Ang 400: Dhan Guru Granth Sahib Ji  ਆਸਾ    ਮਹਲਾ    ੫    ॥  ਡੀਗਨ    ਡੋਲਾ    ਤਊ    ਲਉ    ਜਉ    ਮਨ    ਕੇ    ਭਰਮਾ   ॥  ਭ੍ਰਮ    ਕਾਟੇ    ਗੁਰਿ   ...