Wednesday, October 15, 2025

25. हिन्दी कविता - एक अनुभूति


 ना हूँ मैं वेदना

ना हूँ मैं प्रसन्नता

मैं तो हूँ एक अनुभूति

जो स्वयं को है रुला देती

और हँसा भी देती है कभी - कभी

पर फिर सिमट जाती है

बँधकर अपने आप में

बिना हँसे बिना रोए

और बिना कुछ कहे

जब भी होता है सामना

इस विचित्र अहसास का

तब दिखता है प्रतिबिम्ब धुंधला - सा

हर ओर हर दिशा

जिसमें दिखते हैं कई चेहरे

हँसते हुए रोते हुए

और कुछ चुपी साधे हुए

इसी चिंता में डूबे हुए

क्या केवल एक भाव हूँ मैं

बढ़कर कुछ और नहीं उससे

सुनाई पड़ता है तब एक ठिठोला

जो यह है कहता

तुम जो भी हो

जैसे भी हो

तुम तब तक ही हो

जब तक तुम स्वयं को समझते हो

सुनकर मुस्कुरा पड़ते हैं

वो सभी चिंतित चेहरे

और तब आभास है होता

चाहे अधूरा या उससे भी छोटा

केवल एक दशा नहीं मुस्कुराना

है ये एक ऐसी अवस्था

जिसे कोई भी अनुभूति असक्षम है

सीमा में बाँधने के लिए  | ' तरुण'

No comments:

Post a Comment

26. Baani Dhan Guru Arjan Dev Ji Ki: Ang 400 Dhan Guru Granth Sahib Ji

  Ang 400: Dhan Guru Granth Sahib Ji  ਆਸਾ    ਮਹਲਾ    ੫    ॥  ਡੀਗਨ    ਡੋਲਾ    ਤਊ    ਲਉ    ਜਉ    ਮਨ    ਕੇ    ਭਰਮਾ   ॥  ਭ੍ਰਮ    ਕਾਟੇ    ਗੁਰਿ   ...