चिर संचित कर्म हमारे
व्यर्थ जाएगें 'उसके' द्वारे
ऊँघने दो सपनों को हमारे
बुद्धि को दो चकराने
तन को मारने दो करवटें
मन को दो बोलने
बाँध कर रख दिया इन्होने
नश्वरता के चक्र में
पर क्षणिक संग्रह इन तत्वों का
अनंत की खोज में है चल पड़ा
समय उसका है शत्रु
परिवर्तन उसका है रिपु
भ्रम में डूबा हुआ
शंका में धसा हुआ
कभी पूछेगा प्रश्न ये
कभी भटकेगा अंधकार में
कभी रुदन करेगा
कभी विस्माद में रहेगा
समेट कर सारे तथ्य भी
कुछ पूर्ण होगा नहीं
ना बचोगे यम दंड से
ना ही तुम मुक्त होगे
अगर कुछ मिल भी गया
तो वो केवल मिथ्या होगा
इतने क्षीण है कर्म हमारे
समर्पण बिन केवल हाथ मलोगे | 'तरुण'

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