लेकिन मन अत्याधिक चंचल है। उसको अपने बस में करना सबसे कठिन कार्य है किन्तु असम्भव नहीं है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मन भटकाता है। और जो व्यक्ति मन के वशीभूत हो कर कर्म करते हैं उन्हें गुरमत अनुसार मनमुख कहा गया है। मनमुख का अर्थ है वह व्यक्ति जिसने अपना मुख मन की ओर कर लिया है अर्थात् वो केवल अब अपनी मतानुसार चलता है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थी बन जाता है और कई व्यसन उसे घेर लेते हैं। उसके अंदर अहं की भावना अत्याधिक प्रबल होती है। अहंकार में मद हो कर, वह अपने जीवन को नष्ट और अपने कर्मों को दूषित कर लेता है। जो उसे अन्नत काल तक जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं होने देता। और इसी कारण मन मुखता की अवस्था में वह कभी भी अपने मूल को जान नहीं पाता।
ਮਨਮੁਖਿ
ਭੁਲਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥੩॥[3]
मनमुखि
भुला जनमु गवाइ ॥३॥
तो इसका अर्थ यह है की मनमुख के
लिए मुक्ति की कोई आशा नहीं है? क्या वो चिर काल तक भटकता रहता है? जी
नहीं! ‘अकाल पुरख’ दयालु है, कृपालु है और सब जीवों की
आवश्यकताओं की पूर्ति करता है[4]। ‘वो’ कैसे किसी को भी भंवर
में छोड़ सकता है? इसलिए गुरु का रूप धारण करके 'उसने’
सम्पूर्ण मानव जाति को ‘अपने’ से पुनः जोड़ने का प्रयास किया। और जो मनुष्य गुरु से
जुडे़ वो ‘गुरमुख’ कहलवाए। ‘गुरबाणी’ ने ‘गुरमुख’ की
प्रशंसा की है। अन्नत
वरदानों से उसका आँचल भर दिया है। उसकी विषेशताएँ भी बताई हैं। वह क्या करता है? उसे क्या और क्या नहीं करना चाहिए, इसका भी विस्तार
से वर्णन किया है। और
यह भी बताया है कि ‘गुरमुख’ बनने के क्या लाभ हैं?
‘गुरमुख’ की
गुरु के प्रति निष्ठा को हम जैसे क्षणभंगुर जीव कभी भी वर्णित नहीं कर सकते। इस
महिमा का वर्णन केवल ‘गुरबाणी’ ही कर सकती है जो निम्नलिखित है। संक्षेप में कहें
तो गुरमुख गुरु की ओर मुड़ता है और मनमुख गुरु से दूर हो जाता
है।
ਗੁਰਮੁਖਿ
ਸਨਮੁਖੁ ਮਨਮੁਖਿ ਵੇਮੁਖੀਆ ॥[5]
गुरमुखि
सनमुखु मनमुखि वेमुखीआ ॥
जारी है - गुरमुख कौन है?
[1] यहाँ
उत्पत्ति का अर्थ जैविक उत्पत्ति से नहीं है। विज्ञान ने इस प्रश्न का उत्तर भली भांति
खोज लिया है। यहाँ उत्पति का अर्थ है जीव आत्मा की उत्पत्ति जिसके बिना मनुष्य देह
मृत समझी जाती है। गुरबाणी का उद्देश्य है जीव आत्मा को 'अकाल पुरख' के साथ
जोड़ना।
ਭਈ ਪਰਾਪਤਿ ਮਾਨੁਖ
ਦੇਹੁਰੀਆ ॥ ਗੋਬਿੰਦ ਮਿਲਣ ਕੀ ਇਹ ਤੇਰੀ ਬਰੀਆ ॥
भई परापति मानुख देहुरीआ ॥ गोबिंद
मिलण की इह तेरी बरीआ ॥
आसा महला ५ - अंग १२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[3] आसा महला ३ - अंग ३६३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[4] ਮਿਹਰਵਾਨ ਕਿਰਪਾਲ ਦਇਆਲਾ ਸਗਲੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਏ ਜੀਉ ॥੩॥
मिहरवान किरपाल दइआला सगले त्रिपति अघाए जीउ ॥३॥
माझ महला ५ - अंग १०५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
[5] माझ महला ५ - अंग १३१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी
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