Saturday, September 13, 2025

17. गुरमुख: 'धन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी' के शब्दों के अनुसार

चिर काल से मनुष्य अपने मूल को खोज रहा है। यहाँ मूल का अर्थ है अपने आस्तित्व को समझना और अपने उद्देश्य को जान जाना। जैसे की मेरी उत्पत्ति कैसे हुई[1]? मेरा वास्तविक लक्ष्य[2] क्या है? और ऐसे ही अपने आस्तित्व तथा उद्देश्य से जुड़े अनंत प्रश्नों ने जिज्ञासु मनुष्यों को झिझकोर कर रख दिया। और जिज्ञासुों ने मनुष्य जीवन के मूल को जानना ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। पर इन प्रश्नों को लेकर आज भी बुद्धिजीवी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके हैं उनकी खोज आज भी जारी हैइन प्रश्नों के उत्तर में कई सिद्धांतों को आगे रखा गया पर किसी भी सिद्धांत पर कोई भी आपसी सहमति नहीं बन पाई इसके चलते मनुष्यता केवल वाद-विवादों में ही घिर कर रह गई और केवल भौतिकवाद में ही उलझ गई मानवता भौतिकता में इतना उलझ गयी की केवल इन्द्रियों के रस को ही उसने परम सुख मान लिया जिससे मनुष्यता के आध्यात्मिक तत्व का पतन होने लगा और वो गर्त की और जाने लगी

 परन्तु ‘अकाल पुरख’ के खेल निराले होते हैं अगर'उसने’ मानव मन में जिज्ञासा बीजी थी ‘अपने’ को जानने के लिए और मानवता भटक गई सही पथ से तो, उसने मनुष्यता को मंझधार में नहीं छोड़ दिया अकाल पुरख’ ने ‘गुरु’ के रूप में प्रकट हो कर ‘गुरबाणी’ के माध्यम से, सम्पूर्ण मानव जाति को समझाने का प्रयास किया और इस बात पर अत्याधिक बल दिया कि मूल से जुड़े प्रश्नों के उत्तर तभी सम्भव है जब व्यक्ति अपने जीवन को सुधारने का निरन्तर प्रयास करता रहे। ‘गुरबाणी’ ने निरंतर यही सीख दी है कि मानव मन के मूल को जानना तभी संभव है जब व्यक्ति अपने मन को समझाए, उसे नियंत्रण में रखे और उसे ‘गुरबाणी’ अर्थात गुरु की ओर मोड़े

 

लेकिन मन अत्याधिक चंचल है। उसको अपने बस में करना सबसे कठिन कार्य है किन्तु असम्भव नहीं है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मन भटकाता है। और जो व्यक्ति मन के वशीभूत हो कर कर्म करते हैं उन्हें गुरमत अनुसार मनमुख कहा गया है। मनमुख का अर्थ है वह व्यक्ति जिसने अपना मुख मन की ओर कर लिया है अर्थात् वो केवल अब अपनी मतानुसार चलता है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थी बन जाता है और कई व्यसन उसे घेर लेते हैं। उसके अंदर अहं की भावना अत्याधिक प्रबल होती है अहंकार में मद हो कर, वह अपने जीवन को नष्ट और अपने कर्मों को दूषित कर लेता है। जो उसे अन्नत काल तक जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं होने देता। और इसी कारण मन मुखता की अवस्था में वह कभी भी अपने मूल को जान नहीं पाता। 

ਮਨਮੁਖਿ ਭੁਲਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥੩॥[3]

मनमुखि भुला जनमु गवाइ ॥३॥

 

तो इसका अर्थ यह है की मनमुख के लिए मुक्ति की कोई आशा नहीं है? क्या वो चिर काल तक भटकता रहता है? जी नहीं! ‘अकाल पुरख’ दयालु है, कृपालु है और सब जीवों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है[4]वो’ कैसे किसी को भी भंवर में छोड़ सकता है? इसलिए गुरु का रूप धारण करके 'उसने’ सम्पूर्ण मानव जाति को ‘अपने से पुनः जोड़ने का प्रयास किया। और जो मनुष्य गुरु से जुडे़ वो गुरमुख कहलवाए। गुरबाणी ने गुरमुख की प्रशंसा की हैअन्नत वरदानों से उसका आँचल भर दिया है उसकी विषेशताएँ भी बताई हैंवह क्या करता है? उसे क्या और क्या नहीं करना चाहिए, इसका भी विस्तार से वर्णन किया हैऔर यह भी बताया है कि गुरमुख बनने के क्या लाभ हैं?

 

गुरमुख की गुरु के प्रति निष्ठा को हम जैसे क्षणभंगुर जीव कभी भी वर्णित नहीं कर सकते। इस महिमा का वर्णन केवल गुरबाणी’ ही कर सकती है जो निम्नलिखित है। संक्षेप में कहें तो गुरमुख गुरु की ओर मुड़ता है और मनमुख गुरु से दूर हो जाता है। 

ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਨਮੁਖੁ ਮਨਮੁਖਿ ਵੇਮੁਖੀਆ ॥[5]

गुरमुखि सनमुखु मनमुखि वेमुखीआ ॥

 

तो आइये जानने का प्रयास करें गुरमुख होना कितने सौभाग्य की बात है, धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी’ के शब्दों केअनुसार।

जारी है - गुरमुख कौन है?


[1] यहाँ उत्पत्ति का अर्थ जैविक उत्पत्ति से नहीं है। विज्ञान ने इस प्रश्न का उत्तर भली भांति खोज लिया है। यहाँ उत्पति का अर्थ है जीव आत्मा की उत्पत्ति जिसके बिना मनुष्य देह मृत समझी जाती है। गुरबाणी का उद्देश्य है जीव आत्मा को 'अकाल पुरख' के साथ जोड़ना।

 [2] गुरबाणी ने मनुष्य जीवन का लक्ष्य जीव आत्मा और ‘अकाल पुरख’ के मिलन को माना है

ਭਈ ਪਰਾਪਤਿ ਮਾਨੁਖ ਦੇਹੁਰੀਆ ॥ ਗੋਬਿੰਦ ਮਿਲਣ ਕੀ ਇਹ ਤੇਰੀ ਬਰੀਆ ॥

भई परापति मानुख देहुरीआ ॥ गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥

आसा महला ५ - अंग १२ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[3] आसा महला ३ - अंग ३६३ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[4] ਮਿਹਰਵਾਨ ਕਿਰਪਾਲ ਦਇਆਲਾ ਸਗਲੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਏ ਜੀਉ ॥੩॥

  मिहरवान किरपाल दइआला सगले त्रिपति अघाए जीउ ॥३॥

माझ महला ५ - अंग १०५ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

[5] माझ महला ५ - अंग १३१ धन श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी

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